नरेंद्र मोदी के भक्त और नरेंद्र मोदी के कई कट्टर विरोधी कॉकरोच जनता पार्टी ( अभिजीत दिपके) आंदोलन के बारे में करीब-करीब एक ही भाषा बोल रहे हैं, इतिहास में ऐसे अवसर कभी-कभी ही आते हैं
शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में चल रहे जंतर-मंतर के आंदोलन को टुकड़े-टुकड़े गैंग का आंदोलन, देशद्रोही लोगों का जुटान कहा। यही भाषा कई भाजपा नेता बोल चुके हैं। मोदी भक्त तो सोशल मीडिया पर इन लोगों को देशद्रोहियों के टूलकिट के रूप में ही प्रस्तुत कर रहे हैं। कोई चाहे तो उनके सोशल मीडिया अकॉउंट को खंगाल सकता है।
दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी सरकार और उसके कामकाज के कई कट्टर विरोधी कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को प्रायोजित ( साजिश) आंदोलन कह रहे हैं। प्रायोजित का साफ अर्थ नरेंद्र सरकार और उसके देशी-विदेशी नेटवर्क द्वारा प्रायोजित। कईयों ने इस विषय पर लंबे-लंबे लेख लिखे हैं।
कुछ विद्वान बार-बार इसके पीछे की साजिश को समझने के लिए टिप्पणियां लिख रहे हैं और इसे अन्ना का दूसरा वर्जन कह रहे हैं। उनके हिसाब से अन्ना की ‘आत्मा’ ने अभिजीत दिपके या कुछ की नजर में सोनम वांगचुक के शरीर में प्रवेश कर लिया है। बस शरीर बदला है, ‘आत्मा’ वही है।
कुछ सोनम वांगचुक में अन्ना की ‘आत्मा’ देख रहे हैं और उन्हें अन्ना का दूसरा वर्जन देख रहे हैं।
कुछ अभिजीत को तो प्रायोजित ( साजिश) का हिस्सा मान रहे हैं, लेकिन सोनम वांगचुक की ईमानदारी और सच्चाई पर उन्हें भरोसा है। कुछ तो यह भी कह रहे हैं कि अभिजीत जैसे ‘खलनायक’ की जाल में सोनम वांगचुक फंस गए।
दूसरी तरफ वामपंथी छात्र संगठन और इसके कार्यकर्ता, नेता और बुद्धिजीवियों का बड़ा हिस्सा इस आंदोलन की सीमाओं को तो जानते हैं, लेकिन वे इसमें एक संभावना और आज की जरूरत देख रहे हैं।
हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार खिलाफ संघर्षरत बुद्धिजीवियों, लेखकों, कार्यकर्ताओं, नेताओं और छात्र संगठनों का बड़ा हिस्सा इस आंदोलन की सीमाओं (साजिश या प्रायोजित होना नहीं) को जानते हुए भी इस आंदोलन के साथ है। शुरूआती हिचकों-संशयों से मुक्ति पाकर मजबूती के साथ इस आंदोलन के साथ आज की तारीख में खड़ा है।
कुछ इस आंदोलन को समर्थन देने के लिए इसमें वामपंथी छात्र संगठनों और उनके कार्यकर्ताओं की उपस्थिति का आड़ ले रहे हैं। ये लोग अपनी टिप्पिणियों में यह खुलकर या संकेतों में कह रहे हैं कि मैं तो सिर्फ इसलिए समर्थन कर रहा हूं, क्योंकि इसमें वामपंथी छात्र संगठन हैं।
ऐसे लोग वामपंथी छात्र संगठनों, नेताओं और बुद्धिजीवियों या खुद से यह सवाल क्यों नहीं कर पा रहे हैं कि जब यह आंदोलन सरकार द्वारा प्रायोजित है या बड़ी साजिश का हिस्सा है या नरेंद्र मोदी सरकार विरोधी अन्य आंदोलनों से ध्यान भटकाने की कोशिश है, तो फिर ये वामपंथी या स्वयं वे इसमें शामिल क्यों है?
पर कुछ बुद्धिजीवी, लेखक, पत्रकार और सोशल मीडिया के लोग आज भी इस मामले में भाजपा के नेताओं, मंत्रियों और अंधभक्तों के स्वर-स्वर मिला कर इस साजिश, प्रायोजित आदि कह रहा हैं।
इस स्थिति को मित्र शैलेश ने ज्यादा सहज और सरल रूप में इस प्रकार अभिव्यक्ति दी है-
हममें से ज्यादातर लोग ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ अभियान के दुष्परिणामों के चलते दूध से जली बिल्ली बने हुए हैं।
इस आंदोलन की आलोचना करने वाले तमाम प्रगतिशील बुद्धिजीवी लोग सोशल मीडिया पर हैं, फिर भी हम इन्हें फॉलो कर रहे हैं। तो जो युवा सड़क पर और जमीन पर उतर रहे हैं, क्या उन सब पर कॉन्स्पिरेसी थियरी थोप कर उनसे मुंह मोड़ लिया जाए?
यह सही है कि इनमें से ज्यादातर लोग अनुभवहीन हैं, उन्हें कल तक की योजना नहीं मालूम है कि क्या करना है, किस परिस्थिति से कैसे निपटना है। फिर भी उनकी पहल को सलाम होना चाहिए।
हो सकता हो तो इन रणनीतिकारों को भी वहां अपनी सेवाएं देनी चाहिए।
इतना तो ये लोग भी मानते होंगे कि वहां पहुंचने वाले सारे के सारे लोग साजिशकर्ता नहीं होंगे। कम से कम उनसे संवाद बनाने की तो संभावना होगी ही।
सब कुछ को एक झटके में खारिज कर देना कतई उचित नहीं है।
नोट- फिलहाल इस देश में चल रहे हैं, सभी आंदोलनों-संघर्षों की अपनी-अपनी सीमाएं हैं, उसी तरह इस कॉकरोच पार्टी या अभिजीत दिपके की अपनी सीमाएं और कमजोरियां हैं, लेकिन शुरू से मुझे इस आंदोलन में छात्रों,युवाओं और उनके अभिवावकों के दुख, आक्रोश, असंतोष और हताशा की एक अभिव्यक्ति दिख रही थी और आज भी दिख रही है।
साजिश या प्रायोजित होने की थियरी में मुझे कोई दम नहीं दिखता। हां किसी का डाभोल या देशी-विदेशी वैश्विक एजेंसियों तक पहुंच हो और ठोस प्रमाण हो, जब वह प्रमाण प्रस्तुत होंगे तो देखा जाएगा।
(डॉ सिद्धार्थ लेखक-टिप्पणीकार हैं।)